लोग क्या कहेंगे ।
घबराहतो का दौर बढ़ने लगा है ,
धोखा की गिरफ्त में आम आदमी आने लगा है ।
थक हार कर पूजाघर में गिडगिडाने लगा है ,
कभी ना हाथ फैलाया सर पटकने लगा है ।
यही तो स्थान है
मन की शांति का ,खुद के समझाने समझाने का
घबराहतो के दौर से गुजर रहे आम आदमी का ।
हाशिये के आदमी के साथ आदमी का आतंक
शोषण का रूप भयावह ,
रक्त रंजित नकाब ओढ़े आदमी का
याद है आदमी का छल
विरोध, साजिशें और रिश्ते जख्म पर
नए-नए घाव का ।
आज भी फलफूल रही है
दीन को दीन करने की कारगुजारियां
दहकते हुए दर्द की अंदेखिया।
आदमियत का रिश्ता राख कर रहा
लहू पीकर जीने वाला आदमी ,
हक़, हिस्सा ,तकदीर ठगने में माहिर
हो गया है मतलबी आदमी ।
क्रुन्दन,पेट का पीठ में चिपकना
कराह की लपटें दृश्यमान नहीं होते
हाशिये के आदमी का ,
आदमी ही तो गुनाह कर रहा है
हाशिये के आदमी की तकदीर कैद करने का ।
कुंडली मारे बैठ गया है विषधर सा
हितों पर वज्रपात करने के लिए
दहशत में रखने के लिए ।
हाशिये के आदमी के साथ धोखा
महापाप और भगवान के साथ है धोखा ।
हाशिये के आदमी को खुला आसमान चाहिए
समानता- आर्थिक उन्नति का हक़ चाहिए।
रख लो आदमियत का मान ,
ना सींचो आंसू से अभिमान
हाशिये का आदमी भी चाहता है ,
तरक्की और सम्मान ।
नहीं मिला हक़ तो ललकार करेगे ,
सोचो लहू में तरक्की तलाशने वालो को
क्या कहा है जमाना ,
बदलते वक्त के साथ,
लोग तुम्हे क्या कहेंगे ।
नन्दलाल भारती
०८.०२.२०१०
Monday, February 8, 2010
Saturday, February 6, 2010
जय-जयकार
जय-जयकार
जमाने के भीड़ में मिला भूखा प्यासा
दिया शरण जगा दिया जीने की आशा ।
अपनों के पेट की कर कटोरी
दिया निवाला ,
परिवार दिया सुख सच्चा ,
मतलबी आदमी ने जख्म दे डाला
दिन पलटते आदमी बदल गया
नेकी के माथे बदनामी मढ़ गया।
आदमी से ना सम्बन्ध था
दूर का न पास का ना खून का
सम्बन्ध था तो इंसानियत का ।
बुरे वक्त में था दे दिया आश्रय
खुद के आशियाने में
ना उठी अपनत्व की लहर
विषधर भोंक गया खंजर जिगर में।
मैं क्या मेरी औकात क्या
समय की जादूगरी ईश्वर की सौगात ।
ख़ुशी है एक आदमी सफल हो गया
अपने त्याग से गैर का भविष्य सुधर गया।
दिल तोड़कर गुनाह तो किया
खुदा रखे खुश
नेकी की राह चलने वालो ने
है गुनाह माफ़ किया ।
सच तो है ,
तभी मतलबी को मिलती दुत्कार है ,
परमार्थी की होती जय-जयकार है ।
नन्दलाल भारती
०७-०२-२०१०
जमाने के भीड़ में मिला भूखा प्यासा
दिया शरण जगा दिया जीने की आशा ।
अपनों के पेट की कर कटोरी
दिया निवाला ,
परिवार दिया सुख सच्चा ,
मतलबी आदमी ने जख्म दे डाला
दिन पलटते आदमी बदल गया
नेकी के माथे बदनामी मढ़ गया।
आदमी से ना सम्बन्ध था
दूर का न पास का ना खून का
सम्बन्ध था तो इंसानियत का ।
बुरे वक्त में था दे दिया आश्रय
खुद के आशियाने में
ना उठी अपनत्व की लहर
विषधर भोंक गया खंजर जिगर में।
मैं क्या मेरी औकात क्या
समय की जादूगरी ईश्वर की सौगात ।
ख़ुशी है एक आदमी सफल हो गया
अपने त्याग से गैर का भविष्य सुधर गया।
दिल तोड़कर गुनाह तो किया
खुदा रखे खुश
नेकी की राह चलने वालो ने
है गुनाह माफ़ किया ।
सच तो है ,
तभी मतलबी को मिलती दुत्कार है ,
परमार्थी की होती जय-जयकार है ।
नन्दलाल भारती
०७-०२-२०१०
आदमी के काम आये
आदमी के काम आये
मुसीबत का मारा आदमी बेचारा
भूखा प्यासा ललचाई से ताके ,
करे आत्म मंथन है आदमी
मुसीबत के दिन हो आदमी के तो
कन्धा लगा दे ।
देख दबा मुसीबत के बोझ
भार थामने को हाथ बढ़ाये
आदमी है ,
आदमी की मुसीबत में कामे आये ।
मानता हूँ ,
बेवफाई का घाव खटक है
नेकी में जब हाथ जल जाता है।
ना खींचना हाथ भाई
यही है इंसानियत की कमाई।
मुसीबत मा देना है साथ
आदमी भले ना माने ,
भगवन रखता है हिसाब ।
नेकी का पुण्य ऐसा
कई -कई जन्म धन्य हो जाए
आदमी है ,आदमियत का फ़र्ज़ निभाए
मुसीबत में जरुर काम आये ।
नन्दलाल भारती
०७.०२.२०१०
मुसीबत का मारा आदमी बेचारा
भूखा प्यासा ललचाई से ताके ,
करे आत्म मंथन है आदमी
मुसीबत के दिन हो आदमी के तो
कन्धा लगा दे ।
देख दबा मुसीबत के बोझ
भार थामने को हाथ बढ़ाये
आदमी है ,
आदमी की मुसीबत में कामे आये ।
मानता हूँ ,
बेवफाई का घाव खटक है
नेकी में जब हाथ जल जाता है।
ना खींचना हाथ भाई
यही है इंसानियत की कमाई।
मुसीबत मा देना है साथ
आदमी भले ना माने ,
भगवन रखता है हिसाब ।
नेकी का पुण्य ऐसा
कई -कई जन्म धन्य हो जाए
आदमी है ,आदमियत का फ़र्ज़ निभाए
मुसीबत में जरुर काम आये ।
नन्दलाल भारती
०७.०२.२०१०
Friday, February 5, 2010
परछाइयां
परछाइयां
दिल पर रिसते घाव की तरह
दस्तक दे चुकी है परछाइयां ,
ऊचनीच भेदभाव अमीरी ,
गरीबी की नित गहराती खाइयां ।
छल रही नित यहाँ रुढ़िवादी बुराइयां
युग बदला पर ना बदली,
सामाजिक बुराइयां।
आज भी आदमी छोटा है
जाति के नाम पर धोखा है ।
जवां है भेद की बुराइयां
जाति से छोटा भले व्यक्ति महान
पा रहा रुसुवाइयां ।
मानव मानव एक समान
न कोई छोटा न कोई बड़ा
कर्म गढ़ता है ऊचाईयां
यहाँ है धोखा जातीय योग्यता
बनती निशानिया।
कौन तोड़ेगा भ्रम को
कौन ख़त्म करेगा दूरियां
जातिवाद के नाम बढ़ रही बुराइयां।
मानवता पर बदनुमा धब्बा
सम्मान के साथ जीए
दूसरो को भी मिले समानता का हक़
आदमियत की यही दुहाइयां ।
मानवीय समानता नभ सी ऊचाइयां
बुद्ध हुए भगवान चले आदमियत की राह
अमर है जिनकी कहानिया
आओ करे वादा
ना बोएगे भेद के विषबीज
ना सीचेगे परछाइयां ।
नन्दलाल भारती
०५-२-२०१०
दिल पर रिसते घाव की तरह
दस्तक दे चुकी है परछाइयां ,
ऊचनीच भेदभाव अमीरी ,
गरीबी की नित गहराती खाइयां ।
छल रही नित यहाँ रुढ़िवादी बुराइयां
युग बदला पर ना बदली,
सामाजिक बुराइयां।
आज भी आदमी छोटा है
जाति के नाम पर धोखा है ।
जवां है भेद की बुराइयां
जाति से छोटा भले व्यक्ति महान
पा रहा रुसुवाइयां ।
मानव मानव एक समान
न कोई छोटा न कोई बड़ा
कर्म गढ़ता है ऊचाईयां
यहाँ है धोखा जातीय योग्यता
बनती निशानिया।
कौन तोड़ेगा भ्रम को
कौन ख़त्म करेगा दूरियां
जातिवाद के नाम बढ़ रही बुराइयां।
मानवता पर बदनुमा धब्बा
सम्मान के साथ जीए
दूसरो को भी मिले समानता का हक़
आदमियत की यही दुहाइयां ।
मानवीय समानता नभ सी ऊचाइयां
बुद्ध हुए भगवान चले आदमियत की राह
अमर है जिनकी कहानिया
आओ करे वादा
ना बोएगे भेद के विषबीज
ना सीचेगे परछाइयां ।
नन्दलाल भारती
०५-२-२०१०
Wednesday, February 3, 2010
नसीब लिखने की जिद कर ली है ।
नसीब लिखने की जिद कर ली है ।
मन की कहा था
अपना या गैर था कोई
पर अपना ही समझकर ,
तोड़ा विश्वाश अमानुष ने
बाढ़ का पानी समझकर ।
दिल को ठेस लगी जानकर
दिल खोलने की लालसा थी
पर क्या दिल की किताब
लहुलूहान हो गयी थी ।
कौन सुनता है यहाँ
जिसकी तकदीर कैद हो
सुनेगा भी कैसे
जिह्वा पर रसधार हो
दिल में रखता तलवार हो ।
कर लिया है तहकीकात
आज मुखौटाधारी आदमी ,
मतलब की बात करता है
निकल गया काम तो,
ठोकर मार आगे बढ़ता है ।
सच तो यही है
माथे उदासी आँखों में पानी
दीन पर करे गौर तो ,
दीनता की यही असली कहानी ।
कर लिया है हमने भी पैमाइश
बचने की तलाशने लगा हूँ गुन्जाइश ।
मकसद को तराश कर ,
चलना सीख लिया है
आदमियत की राह को,
जीवन का उद्देश्य बना लिया है ।
अब तो हमने ना कहने और
न मांगने की जिद कर ली है
खुदा को मान गवाह,
नसीब लिखने की जिद कर
ली है ।
नन्दलाल भारती
०३-०२-2010
मन की कहा था
अपना या गैर था कोई
पर अपना ही समझकर ,
तोड़ा विश्वाश अमानुष ने
बाढ़ का पानी समझकर ।
दिल को ठेस लगी जानकर
दिल खोलने की लालसा थी
पर क्या दिल की किताब
लहुलूहान हो गयी थी ।
कौन सुनता है यहाँ
जिसकी तकदीर कैद हो
सुनेगा भी कैसे
जिह्वा पर रसधार हो
दिल में रखता तलवार हो ।
कर लिया है तहकीकात
आज मुखौटाधारी आदमी ,
मतलब की बात करता है
निकल गया काम तो,
ठोकर मार आगे बढ़ता है ।
सच तो यही है
माथे उदासी आँखों में पानी
दीन पर करे गौर तो ,
दीनता की यही असली कहानी ।
कर लिया है हमने भी पैमाइश
बचने की तलाशने लगा हूँ गुन्जाइश ।
मकसद को तराश कर ,
चलना सीख लिया है
आदमियत की राह को,
जीवन का उद्देश्य बना लिया है ।
अब तो हमने ना कहने और
न मांगने की जिद कर ली है
खुदा को मान गवाह,
नसीब लिखने की जिद कर
ली है ।
नन्दलाल भारती
०३-०२-2010
Tuesday, February 2, 2010
यादें
यादें
बिछुड़े सब हम भी एक दिन बिछुड़ जायेगे
हाथ कस कर क्यों न पकडे , छुट जायेगे ।
विसर जायेगे पर यांदे न,
जमाने से विसर पायेगी
मीठी या कडवी यही रह जायेगी ।
अपनो के बिछुड़ने की पीड़ा सताया करेगी
दिल को बार-बार रुलाया करेगी ।
जो आये बिछुड़ते गए
सगे या पराये हुए
कुछ यादे अमिट छोड़ तो गये
माँ की तरह
पर सब बिछुड़ते गए ।
दुनिया की रीति है
यादो को सजाये
जीवन पथ पर चलते रहना ,
सपनों को अपना बनाये रहना ।
जान गया है जीव
ना रहेगा कोई अमर
है खुशी बोया सद्कर्म का बीज
चला आदमियत के राह
सच याद रह जायेगी
काल के गाल पर ।
सच तो है
बिछुड़ने का गम कहा सताया
आदमी दूसरो के काम आया ।
मर कर भी अमर हो गया
कोई बुद्ध कोई ईसा कोई
सम्भुख कोई महावीर हो गया ।
ये कहा जीए अपने लिए
हुए अमर जिए औरो के लिए ।
काल के गाल पर छाप रह जाएगी
जमाने से याद ना बिसर पायेगी ।,
आओ चले नेकी की राह
नफ़रत की दीवार को गिराकर
यांदे रहेगी कुसुमित सदा
आदमियत की राह
जीवन सफल बनायेगी ।
नन्दलाल भारती
०२-०२-२०१०
बिछुड़े सब हम भी एक दिन बिछुड़ जायेगे
हाथ कस कर क्यों न पकडे , छुट जायेगे ।
विसर जायेगे पर यांदे न,
जमाने से विसर पायेगी
मीठी या कडवी यही रह जायेगी ।
अपनो के बिछुड़ने की पीड़ा सताया करेगी
दिल को बार-बार रुलाया करेगी ।
जो आये बिछुड़ते गए
सगे या पराये हुए
कुछ यादे अमिट छोड़ तो गये
माँ की तरह
पर सब बिछुड़ते गए ।
दुनिया की रीति है
यादो को सजाये
जीवन पथ पर चलते रहना ,
सपनों को अपना बनाये रहना ।
जान गया है जीव
ना रहेगा कोई अमर
है खुशी बोया सद्कर्म का बीज
चला आदमियत के राह
सच याद रह जायेगी
काल के गाल पर ।
सच तो है
बिछुड़ने का गम कहा सताया
आदमी दूसरो के काम आया ।
मर कर भी अमर हो गया
कोई बुद्ध कोई ईसा कोई
सम्भुख कोई महावीर हो गया ।
ये कहा जीए अपने लिए
हुए अमर जिए औरो के लिए ।
काल के गाल पर छाप रह जाएगी
जमाने से याद ना बिसर पायेगी ।,
आओ चले नेकी की राह
नफ़रत की दीवार को गिराकर
यांदे रहेगी कुसुमित सदा
आदमियत की राह
जीवन सफल बनायेगी ।
नन्दलाल भारती
०२-०२-२०१०
Monday, February 1, 2010
सन्देश ......
सन्देश ......
हे प्राणनाथ अब तो सुन लो
आओं उड़ चले उस देश
जहाँ आँखे हो जाए हरी ,
पेड़ हरे भरे हो जैसे दरवेश ।
खूब खेले आँख मिचौली ,
चुल्लू भर- भर पानी पीये
फुदक-फुदक चुंगे दाना
झाड़ो के बीच हम जीयें ।
ना हो आरे की कर-कर
ना चीखते स्वर ,
ईंट पत्थरो की जोर-जोरी का चढ़ा
है ज्वर ।
प्यास बढ़ रही
सूरज आग बरस रहा
तन छाया को तरस रहा।
जल रहा सब कुछ
ना जीवन बच पायेगा
पानी-पानी करते करते,
तन सुलग जाएगा ।
प्रिये क्यों कहती
छोड़ने को अपना देश
जल जंगल जीवन का बांटे सन्देश ।
गलती ना कर अब ले सब वादा
ना रचे साजिश ,
वरना राख हो जाएगे सब दादा ।
आओ प्रिये चले
चुन-चुन कर बीज लाते है
अपने रक्त से पाल पोस बढ़ाते है ।
पड़ोस वाले को दूर-दूर सभी को बतायेगे
पेड़ लग्गाने की कसम दिलायेगे ।
सभी एक -एक लगायेगे
तो हरा भरा हो जायेगा चमन
होगी खूब बरसा,
फलेगा फूलेगा गुलशन ।
प्राणनाथ ठीक तो है
ए तो सभी जानते है
महत्व पेड़ का कहाँ मानते है ।
प्रिये कुछ भी हो
संकल्प पक्का है हमारा ,
जन जन को देगे
जल जंगल ही जीवन का सन्देश
प्राण प्यारे हम साथ तुम्हारे
बढियां है उपदेश ।
जन्मभूमि स्वर्ग से प्यारी,
ना जायेगे हम परदेश
आओ चले
जन-जन को बांटे हरियाली खुशहाली का सन्देश ......
नन्दलाल भारती
हे प्राणनाथ अब तो सुन लो
आओं उड़ चले उस देश
जहाँ आँखे हो जाए हरी ,
पेड़ हरे भरे हो जैसे दरवेश ।
खूब खेले आँख मिचौली ,
चुल्लू भर- भर पानी पीये
फुदक-फुदक चुंगे दाना
झाड़ो के बीच हम जीयें ।
ना हो आरे की कर-कर
ना चीखते स्वर ,
ईंट पत्थरो की जोर-जोरी का चढ़ा
है ज्वर ।
प्यास बढ़ रही
सूरज आग बरस रहा
तन छाया को तरस रहा।
जल रहा सब कुछ
ना जीवन बच पायेगा
पानी-पानी करते करते,
तन सुलग जाएगा ।
प्रिये क्यों कहती
छोड़ने को अपना देश
जल जंगल जीवन का बांटे सन्देश ।
गलती ना कर अब ले सब वादा
ना रचे साजिश ,
वरना राख हो जाएगे सब दादा ।
आओ प्रिये चले
चुन-चुन कर बीज लाते है
अपने रक्त से पाल पोस बढ़ाते है ।
पड़ोस वाले को दूर-दूर सभी को बतायेगे
पेड़ लग्गाने की कसम दिलायेगे ।
सभी एक -एक लगायेगे
तो हरा भरा हो जायेगा चमन
होगी खूब बरसा,
फलेगा फूलेगा गुलशन ।
प्राणनाथ ठीक तो है
ए तो सभी जानते है
महत्व पेड़ का कहाँ मानते है ।
प्रिये कुछ भी हो
संकल्प पक्का है हमारा ,
जन जन को देगे
जल जंगल ही जीवन का सन्देश
प्राण प्यारे हम साथ तुम्हारे
बढियां है उपदेश ।
जन्मभूमि स्वर्ग से प्यारी,
ना जायेगे हम परदेश
आओ चले
जन-जन को बांटे हरियाली खुशहाली का सन्देश ......
नन्दलाल भारती
Subscribe to:
Posts (Atom)
