दृष्टिवृष्टि
हादशा याद रहेगा
खून के लिए तो नहीं था
कम भी ना था
चाहुतरफा आक्रमण
पहचान पर, कर्मशीलता
व्यक्तित्व वफादारी का खून था
वह हादशा ।
गूँज रहा था
आज के कंस का अट्टहास
कलेजे को छेदकर
बोया गया आग
क्योंकि
श्रमिक ढूढ़ रहा था अस्तित्व
दे रहा था
अगिन परीक्षा बार- बार ।
सही उत्तर के बाद भी
कर दिया जा रहा था फेल
तरक्की भागी जा रही थी
कोसो पीछे ,
साबित कर दिया जा रहा था
बेकार
मजबूर किया जा रहा था
करने को बेगार ।
यही हो रहा है
सदियों से कमजोर के साथ
नहीं आ रही है
तरक्की हाथ ।
पांच जून का हादशा गवाह है
अधिकार हनन ,दमन और संघर्ष का
कैसे बयां करू हादशे का
समझ लीजिये
अधपकी फसल पर ओलावृष्टि
कर रही है तबाह
दृष्टिवृष्टि दबे-कुचलों का जीवन -----नन्दलाल भारती .... ०८.०६.२०१०
Thursday, June 10, 2010
Tuesday, June 8, 2010
सम्मान की तलाश
सम्मान की तलाश ॥
अंग्रेज भाग गए
सर पर पांव रखे दशको पहले
परन्तु सम्मान की तलाश पूरी नहीं हुई
हाशिये के आदमी की ।
राजनीति के उथल-पुथल के दौर में
नगाडो का शोर सुनाई पड़ जाता है
समानता के बादल
तनिक देर के लिए आते है
फिर एकदम से छंट जाते है
सामाजिक ठेकेदारों की फुफकार के आगे ।
शोरे थम जाता है पांच साल के लिए
समानता का ऐलान मौन हो जाता है
सत्ता के गलियारे में
चल पड़ता है घमासान ।
भूल जाता है समानता का वादा
एजेंडे से गायब हो जाती है समानता
पसर जाता है घनघोर अँधियारा ।
जातिभेद का जहर कर रहा शर्मिंदा
विधान संविधान में सर्व समानता का जोर
भारतीय समाज में जातिवाद का शोर
दबे कुचलों की सरकारी मदद का विरोध पुरजोर
सामाजिक आर्थिक समानता से दुत्कार
शोषित समानता के लिए कुर्बानी को तैयार ।
भेदभाव उस सत्तावान की याद है
जिसने बोये है नफ़रत के बीज
सत्ता के लिए
हाशिये के आदमी को उबरने नहीं
देता आज भी
बसर कर रहा दोयम दर्जे का आदमी होकर
अपने गाव अपनी माटी और अपने देश में ।
भगवान बुद्ध ,महावीर ,
गुरुनानक की क्रांति अधूरी है
जोह रही है बाट
युगों बाद भी पूरी होने के लिए
सामाजिक-राजनैतिज्ञ नेता वाकयुद्ध छेड़ते है
फिर दोयम दर्जे के आदमी की व्यथा भूल जाते है
पांच साल के लिए ।
आते चुनाव खुरचते है घाव सत्ता के लिए
क्या इस तरह कभी मिटेगी नफ़रत की खाई ?
पूरी होगी चौथे दर्जे के आदमी के सम्मान की तलाश .......नन्द लाल भारती ०७-०६-२०१०
अंग्रेज भाग गए
सर पर पांव रखे दशको पहले
परन्तु सम्मान की तलाश पूरी नहीं हुई
हाशिये के आदमी की ।
राजनीति के उथल-पुथल के दौर में
नगाडो का शोर सुनाई पड़ जाता है
समानता के बादल
तनिक देर के लिए आते है
फिर एकदम से छंट जाते है
सामाजिक ठेकेदारों की फुफकार के आगे ।
शोरे थम जाता है पांच साल के लिए
समानता का ऐलान मौन हो जाता है
सत्ता के गलियारे में
चल पड़ता है घमासान ।
भूल जाता है समानता का वादा
एजेंडे से गायब हो जाती है समानता
पसर जाता है घनघोर अँधियारा ।
जातिभेद का जहर कर रहा शर्मिंदा
विधान संविधान में सर्व समानता का जोर
भारतीय समाज में जातिवाद का शोर
दबे कुचलों की सरकारी मदद का विरोध पुरजोर
सामाजिक आर्थिक समानता से दुत्कार
शोषित समानता के लिए कुर्बानी को तैयार ।
भेदभाव उस सत्तावान की याद है
जिसने बोये है नफ़रत के बीज
सत्ता के लिए
हाशिये के आदमी को उबरने नहीं
देता आज भी
बसर कर रहा दोयम दर्जे का आदमी होकर
अपने गाव अपनी माटी और अपने देश में ।
भगवान बुद्ध ,महावीर ,
गुरुनानक की क्रांति अधूरी है
जोह रही है बाट
युगों बाद भी पूरी होने के लिए
सामाजिक-राजनैतिज्ञ नेता वाकयुद्ध छेड़ते है
फिर दोयम दर्जे के आदमी की व्यथा भूल जाते है
पांच साल के लिए ।
आते चुनाव खुरचते है घाव सत्ता के लिए
क्या इस तरह कभी मिटेगी नफ़रत की खाई ?
पूरी होगी चौथे दर्जे के आदमी के सम्मान की तलाश .......नन्द लाल भारती ०७-०६-२०१०
Monday, June 7, 2010
वक्त के कैनवास पर
वक्त के कैनवास पर ॥
छांव को छांव मान लेना भूल हो गयी
परछाइयां भी रूप बदलने लगी है
दाव पाते कलेजा चोथ लेती है
कहा खोजे छांव अब तो
छांव भी आग उगलने लगी है ।
छांव की नियति में बदलाव आ गया है
वह भी शीतलता देती है पहचानकर
छांव में अरमानो का जनाजा सजने लगा है
क़त्ल का पैगाम मिलने लगा है ।
मुश्किल से कट रहे बसंत के दिन
शामियाने में मातम फुफकारने लगा है
उम्र की भोर में शाम पसारने लगी है
तमन्ना थी विहान होगा सजेगे सितारे
कलयुग में नसीब तड़पने लगी है ।
मधुमास को मलमास डसने लगा है
नहीं तरकीब कोई चाँद पाने के लिए
उम्र गुजर रही सदकर्म की राह पर
बहुरूपिये छाव ने दग़ा है किये
बेश्या के प्यार की तरह
आदमी छाव में धूप बोने लगा है ।
खौफ खाने लगा है ,
ना विदा हो जाऊ
छांव से सुलगता हुआ
सपनों की बारात लिए
ऐसा कैसे होगा ?
भले जमाना ना सुने फ़रियाद
फ़रियाद करूगा कलम से
वक्त के कैनवास पर
लिखूगा बेगुनाही की दास्तान
भले क़त्ल कर दिए जाए सपने
मै संभावना में कर लूगा बसर
कलम थामे कल के लिए ...... नन्दलाल भारती ०६-०६-२०१०
छांव को छांव मान लेना भूल हो गयी
परछाइयां भी रूप बदलने लगी है
दाव पाते कलेजा चोथ लेती है
कहा खोजे छांव अब तो
छांव भी आग उगलने लगी है ।
छांव की नियति में बदलाव आ गया है
वह भी शीतलता देती है पहचानकर
छांव में अरमानो का जनाजा सजने लगा है
क़त्ल का पैगाम मिलने लगा है ।
मुश्किल से कट रहे बसंत के दिन
शामियाने में मातम फुफकारने लगा है
उम्र की भोर में शाम पसारने लगी है
तमन्ना थी विहान होगा सजेगे सितारे
कलयुग में नसीब तड़पने लगी है ।
मधुमास को मलमास डसने लगा है
नहीं तरकीब कोई चाँद पाने के लिए
उम्र गुजर रही सदकर्म की राह पर
बहुरूपिये छाव ने दग़ा है किये
बेश्या के प्यार की तरह
आदमी छाव में धूप बोने लगा है ।
खौफ खाने लगा है ,
ना विदा हो जाऊ
छांव से सुलगता हुआ
सपनों की बारात लिए
ऐसा कैसे होगा ?
भले जमाना ना सुने फ़रियाद
फ़रियाद करूगा कलम से
वक्त के कैनवास पर
लिखूगा बेगुनाही की दास्तान
भले क़त्ल कर दिए जाए सपने
मै संभावना में कर लूगा बसर
कलम थामे कल के लिए ...... नन्दलाल भारती ०६-०६-२०१०
Saturday, June 5, 2010
सुलगते सवाल
सुलगते सवाल ॥
पद दलित अपराध तो नहीं
हो गया है ,
ऊपर उठे श्रेष्ठ की निगाहों में
पद-दलित को आँका जाता है गुलाम
क्यों ना हो कई गुना अधिक योग्य
योग्यता बौनी है
श्रेष्ठता के आगे आज भी ।
श्रेष्ठ के गुमान में हो रहा है अपराध
हो रहा है अभिशापित छोटे पद पर
काम करने वाला उच्च शिक्षित आदमी
धकिया दी जाती है
बड़ी-बड़ी डिग्रिया और ऊँचा कद भी ।
श्रेष्ठता होती है छाव ज़माने के लिए
दुर्भाग्य करने लगी है
गुनाह बरसने लगी है आग
पद-दलित का भविष्य तबाह करने के लिए
मान लेता है जन्म सिध्द अधिकार
शोषण,उत्पीडन और उपभोग का
श्रेष्ठता के खंजर से जीतता ओहदेदार ।
भूल जाता है
पद दलित सजा नहीं व्यवस्था है
कुव्यवस्था के चक्र में अभिशाप
सफलता और सुख की आस में
मेहनत,लगन,ईमानदारी के बदले
पद-दलित पता है
प्रताड़ना भोगता है अभिशाप ।
दुर्भाग्यबस पद दलित -दलित हो गया
आ गया रुढ़िवादी व्यवस्था से आच्छादित
संस्था की चाकरी में तो समझो
जीवन का बसंत हो गया पतझड़
हिस्से की तरक्की बदल गयी रास्ता ।
यही तो चल रहा है गोरखधंधा
योग्यता घायल है रुढ़िवादी व्यवस्था में
और तरक्की के शिखर है पैदाइसी श्रेष्ठता
हक़ से बेदखल पद-दलित की उम्र का
बसंत हो रहा है अभिशापित।
निरापद कब तक कटेगा सजा , बिन गुनाह की
कब तक तडपेगी योग्यता
कब तक अवरूध्द रहेगी तरक्की
कब तक टूटेगे खुली आँखों के सपने
कब तक भंग होगी जीवन की तपस्या
कब तक पद-दलित रहेगा अभिशापित
क्या कभी होगे हल ये सुलगते सवाल
क्या-पद -दलितों को मिलेगा खुला आसमान ...........नन्द लाल भारती ०४-०६-२०१०
पद दलित अपराध तो नहीं
हो गया है ,
ऊपर उठे श्रेष्ठ की निगाहों में
पद-दलित को आँका जाता है गुलाम
क्यों ना हो कई गुना अधिक योग्य
योग्यता बौनी है
श्रेष्ठता के आगे आज भी ।
श्रेष्ठ के गुमान में हो रहा है अपराध
हो रहा है अभिशापित छोटे पद पर
काम करने वाला उच्च शिक्षित आदमी
धकिया दी जाती है
बड़ी-बड़ी डिग्रिया और ऊँचा कद भी ।
श्रेष्ठता होती है छाव ज़माने के लिए
दुर्भाग्य करने लगी है
गुनाह बरसने लगी है आग
पद-दलित का भविष्य तबाह करने के लिए
मान लेता है जन्म सिध्द अधिकार
शोषण,उत्पीडन और उपभोग का
श्रेष्ठता के खंजर से जीतता ओहदेदार ।
भूल जाता है
पद दलित सजा नहीं व्यवस्था है
कुव्यवस्था के चक्र में अभिशाप
सफलता और सुख की आस में
मेहनत,लगन,ईमानदारी के बदले
पद-दलित पता है
प्रताड़ना भोगता है अभिशाप ।
दुर्भाग्यबस पद दलित -दलित हो गया
आ गया रुढ़िवादी व्यवस्था से आच्छादित
संस्था की चाकरी में तो समझो
जीवन का बसंत हो गया पतझड़
हिस्से की तरक्की बदल गयी रास्ता ।
यही तो चल रहा है गोरखधंधा
योग्यता घायल है रुढ़िवादी व्यवस्था में
और तरक्की के शिखर है पैदाइसी श्रेष्ठता
हक़ से बेदखल पद-दलित की उम्र का
बसंत हो रहा है अभिशापित।
निरापद कब तक कटेगा सजा , बिन गुनाह की
कब तक तडपेगी योग्यता
कब तक अवरूध्द रहेगी तरक्की
कब तक टूटेगे खुली आँखों के सपने
कब तक भंग होगी जीवन की तपस्या
कब तक पद-दलित रहेगा अभिशापित
क्या कभी होगे हल ये सुलगते सवाल
क्या-पद -दलितों को मिलेगा खुला आसमान ...........नन्द लाल भारती ०४-०६-२०१०
Friday, June 4, 2010
विरोध
विरोध ॥
तल्ख़ बयानबाजी हुनर का विरोध
आखिरी आदमी के अरमानो का क़त्ल
व्यक्ति या वर्ग ख़ास के लिए
तोहफा हो सकता है
परन्तु
आखिरी आदमी देश और
सभ्य समाज के लिए विषधर ।
आखिरी आदमी कायनात का पुष्प है
क़लिया सूख जाती है पुष्प बनाने से पहले
सुगंध पर लगे है पहरे
कब जवान हुआ ? बूढ़ा हुआ पता चला
आखिरी आदमी को सहानुभूति की नहीं
हक़ की दरकार है ।
आखिर आदमी की योग्यता कम आंकी जाती है
विशेषता नजर नहीं आती है
अँधेरे में रखने की साजिश चलती रहती है
घमासान इक्कसवी सदी के उजाले में ।
हक़ की बयार स्वार्थ बस चल पड़ती है
आस उजास में पंख फड फड़ाने लगती है
भूचाल आ जाता है, जंग छिड़ जाती है
फिर एकदम सब कुछ जम जाता है
पाषाण की तरह
विरोध सदियों से चल रहा है
तभी तो इक्कसवी सदी में आदमी अछूत है
तरक्की की बाट जोह रहे को हक़ चाहिए
कशी से संसद तक, जंगल से जमीन तक
वह उपजा सकता है धरती से सोना
भर सकता है सूखती नदियों में जल
बहा सकता है दूध-घी की गंगा
कायनात का अमृत बीज है आखिरी आदमी
कुसुमित होना है उसे
हक़ की दरकार है विरोध की नहीं ......नन्दलाल भारती...०३.०६.२०१०
तल्ख़ बयानबाजी हुनर का विरोध
आखिरी आदमी के अरमानो का क़त्ल
व्यक्ति या वर्ग ख़ास के लिए
तोहफा हो सकता है
परन्तु
आखिरी आदमी देश और
सभ्य समाज के लिए विषधर ।
आखिरी आदमी कायनात का पुष्प है
क़लिया सूख जाती है पुष्प बनाने से पहले
सुगंध पर लगे है पहरे
कब जवान हुआ ? बूढ़ा हुआ पता चला
आखिरी आदमी को सहानुभूति की नहीं
हक़ की दरकार है ।
आखिर आदमी की योग्यता कम आंकी जाती है
विशेषता नजर नहीं आती है
अँधेरे में रखने की साजिश चलती रहती है
घमासान इक्कसवी सदी के उजाले में ।
हक़ की बयार स्वार्थ बस चल पड़ती है
आस उजास में पंख फड फड़ाने लगती है
भूचाल आ जाता है, जंग छिड़ जाती है
फिर एकदम सब कुछ जम जाता है
पाषाण की तरह
विरोध सदियों से चल रहा है
तभी तो इक्कसवी सदी में आदमी अछूत है
तरक्की की बाट जोह रहे को हक़ चाहिए
कशी से संसद तक, जंगल से जमीन तक
वह उपजा सकता है धरती से सोना
भर सकता है सूखती नदियों में जल
बहा सकता है दूध-घी की गंगा
कायनात का अमृत बीज है आखिरी आदमी
कुसुमित होना है उसे
हक़ की दरकार है विरोध की नहीं ......नन्दलाल भारती...०३.०६.२०१०
सिलसिला
सिलसिला ॥
ये लोग कौन है आदमी को
धर्म-जाति-वंश की तुला पर आंकने वाले
आदमी तो आदमी है
बस नर-नारी की ओ जातियों में विभाजित है
फिर विवाद कैसा ?
आंकना है तो आंको ना
कर्म ज्ञान कद की योग्यता को
और
मानवजाति के हितार्थ दिए अवदान को
काल के ताज पर यही विराजते है ।
खंडित लोग बो रहे है विष
धर्म-जाति-वंश के श्रेष्ठता के गुमान
कर रहे है बेख़ौफ़ गुनाह
कही घर-परिवार सुलगा दिए जाते है
दिल में दाल दी जाती है दरारे
ये सिलसिला ख़त्म नहीं हो रहा है
ना जाने क्यों ?
दुनिया सिमट गयी विज्ञानं के युग में
एक और आदमी तराश रहा है तलवार
धर्म-जाति-वंश के नाम
भरम में कई बेगुनाहों की बलि दी जाती है
कियो की तक़दीर उजाड़ दी जाती है
कियो की कैद कर ली जाती है नसीब
कई अभागो को बना लिया जाता है गुलाम
सुख छीन लिया जाता है आदमी होने का
आदमी के हाथो ये गुनाह क्यों ?
कब तक बंटता रहेगा आदमी
कब तक अपवित्र रहेगा कुए का पानी
कब तक अछूत रहेगा आदमी
कब खुलेगे तरक्की के द्वार
कब होगी आदमियत की जयजयकार
कब पायेगा अधिकार आमआदमी
काश ये सिलसिला चल पड़ता ...........नन्दलाल भारती ०२.०६.२०१०
ये लोग कौन है आदमी को
धर्म-जाति-वंश की तुला पर आंकने वाले
आदमी तो आदमी है
बस नर-नारी की ओ जातियों में विभाजित है
फिर विवाद कैसा ?
आंकना है तो आंको ना
कर्म ज्ञान कद की योग्यता को
और
मानवजाति के हितार्थ दिए अवदान को
काल के ताज पर यही विराजते है ।
खंडित लोग बो रहे है विष
धर्म-जाति-वंश के श्रेष्ठता के गुमान
कर रहे है बेख़ौफ़ गुनाह
कही घर-परिवार सुलगा दिए जाते है
दिल में दाल दी जाती है दरारे
ये सिलसिला ख़त्म नहीं हो रहा है
ना जाने क्यों ?
दुनिया सिमट गयी विज्ञानं के युग में
एक और आदमी तराश रहा है तलवार
धर्म-जाति-वंश के नाम
भरम में कई बेगुनाहों की बलि दी जाती है
कियो की तक़दीर उजाड़ दी जाती है
कियो की कैद कर ली जाती है नसीब
कई अभागो को बना लिया जाता है गुलाम
सुख छीन लिया जाता है आदमी होने का
आदमी के हाथो ये गुनाह क्यों ?
कब तक बंटता रहेगा आदमी
कब तक अपवित्र रहेगा कुए का पानी
कब तक अछूत रहेगा आदमी
कब खुलेगे तरक्की के द्वार
कब होगी आदमियत की जयजयकार
कब पायेगा अधिकार आमआदमी
काश ये सिलसिला चल पड़ता ...........नन्दलाल भारती ०२.०६.२०१०
Tuesday, June 1, 2010
उम्मीद
उम्मीद
उम्मीद पर उम्मीद जीवन रसधार
गैर उम्मीद ,टूटी हिम्मत डूबे मझधार ।
जीवन का दुःख-सुख, ओढ़ना-बिछौना
उम्मीद पर ऊँगली रिश्ता हुआ बौना ।
उम्मीद बोती निराशा में अमृत आशा
जन-जन समझे उम्मीद की परिभाषा ।
उम्मीद के समंदर जीवित है सपने
टूटी उम्मीद ,बिखरी चाहत ,बैर हुए अपने ।
उम्मीद है बाकी पतझड़ में बरसे बसंत
उम्मीद का ना कोई ओर-छोर ना है अंत ।
उम्मीद विश्वास , बन जाते जग के बिगड़े काम
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर बुद्ध का कहे पैगाम ।
उम्मीद जीवन या दूजा नाम धरे भगवान्
उम्मीद है जीवन की डोर, टूटी हुआ विरान ।
मैंने भी थाम लिया है उम्मीद का दामन
चली तलवार बार-बार नसीब बनी रेगिस्तान ।
काबिलियत का क़त्ल हक़ पर सुलगे सवाल
लूटी नसीब सरेआम खड़ा तान ऊँचा भाल ।
अभिमान दहके फूटा शोला विष सामान
उम्मीद के दामन लिपटा गढ़ गयी पहचान ।
उम्मीद वन्दनीय गाड,खुदा , प्रभु का प्रतिरूप
मान लिया मैंने लाख बोये कोई विष बीज
जमी रहे परते उम्मीद की छंट जाएगी धूप।
नन्दलाल भारती
०१.०६.2010
उम्मीद पर उम्मीद जीवन रसधार
गैर उम्मीद ,टूटी हिम्मत डूबे मझधार ।
जीवन का दुःख-सुख, ओढ़ना-बिछौना
उम्मीद पर ऊँगली रिश्ता हुआ बौना ।
उम्मीद बोती निराशा में अमृत आशा
जन-जन समझे उम्मीद की परिभाषा ।
उम्मीद के समंदर जीवित है सपने
टूटी उम्मीद ,बिखरी चाहत ,बैर हुए अपने ।
उम्मीद है बाकी पतझड़ में बरसे बसंत
उम्मीद का ना कोई ओर-छोर ना है अंत ।
उम्मीद विश्वास , बन जाते जग के बिगड़े काम
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर बुद्ध का कहे पैगाम ।
उम्मीद जीवन या दूजा नाम धरे भगवान्
उम्मीद है जीवन की डोर, टूटी हुआ विरान ।
मैंने भी थाम लिया है उम्मीद का दामन
चली तलवार बार-बार नसीब बनी रेगिस्तान ।
काबिलियत का क़त्ल हक़ पर सुलगे सवाल
लूटी नसीब सरेआम खड़ा तान ऊँचा भाल ।
अभिमान दहके फूटा शोला विष सामान
उम्मीद के दामन लिपटा गढ़ गयी पहचान ।
उम्मीद वन्दनीय गाड,खुदा , प्रभु का प्रतिरूप
मान लिया मैंने लाख बोये कोई विष बीज
जमी रहे परते उम्मीद की छंट जाएगी धूप।
नन्दलाल भारती
०१.०६.2010
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