साजिश
मैं जो कुछ दुःख पाया है
दुःख से उपजे आंसू से कल सींचा है।
आंसू से सींचे कल से
मेरा ही नही जनहित का वास्ता है
सद्कर्म की रह चलना,
विरोध का दरिया पार करना है ।
जिस जहाँ में खंड-खंड आदमी हो
वहां तो ठोकरे ,
पग-पग शूलों का मिलना है ।
सच अब मेहनतकश से ,
दूर होता जा रहा है सब कुछ
छाती पर मूंग दल रहा दुर्दशा ,अभाव
और भी बहुत कुछ ।
कैसे पायेगा इन्साफ दबा कुचला इंसान
आज़ादी दूर बहुत पर नहीं पहुचता ध्यान ।
गूगे बहरे एहसास शून्य हुए लोग
ठेंगा दिखाना जान गए हैं चालबाज लोग ।
आम इंसान हाड्फोड़ता हिस्से चोट
वक्त आंसू से रोटी गीला करने का
दहशत भरती जीवन में रुतबे की ओट।
दफन होती बिन कफ़न ,
मेहनत सच्चाई आज
कमजोर के दमन का काबिज कुराज।
हक़ की छिना-छपटी,
आतंक ,भ्रष्टाचार पनप रहा है
कैसे होगा शोषित कमजोर का भला
सबल आदमी दुर्बल के दमन की,
साजिश रच रहा ।
नन्दलाल भारती
०९-०२-२०१०
Tuesday, February 9, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment